खामोश रहो,
गर मारा जाए कोई भीड़ में,
फिर हो जाए उसके घर में मातम
तुम सवाल न करना किसी से
क्यूँ मरा ?क्या क़ुसूर था इसका?
बस खामोश रहो,
गर उसके मुजरिम को फिर भी
मिल जाए कोई आला ओहदा
और जम्हूरियत का हो जाए सौदा
फिर भी अपने सर ख़म लो तुम
और खामोश रहो
क्या फर्क पड़ता है। बिलकुल नहीं!
मरने वाला न भाई था न ही संबंधी
फिर क्यूँ बोलोगे तुम! हरगिज़ नहीं
पूछने का तो अब कोई जवाज़ ही नहीं
तो खामोश रहो,
फिर भी अगर झिंझोड़े ज़मीर तुम्हारी
और आत्मा पूछ ही डाले तुम्हारी
तो बस कह देना : न ही मैं देशद्रोही
न अरबन नक़सल कहलाने का शौकीं
इस लिए खामोश रहो
फिर आ जाए जब तुम्हारी बारी
और भीड़ पड़ जाए तुम पे भारी
तो शिक़वा न करना किसी से भी
तुम ने भी इख्तियार की थी खामोशी!
बस, अब भी खामोश रहो
गर मारा जाए कोई भीड़ में,
फिर हो जाए उसके घर में मातम
तुम सवाल न करना किसी से
क्यूँ मरा ?क्या क़ुसूर था इसका?
बस खामोश रहो,
गर उसके मुजरिम को फिर भी
मिल जाए कोई आला ओहदा
और जम्हूरियत का हो जाए सौदा
फिर भी अपने सर ख़म लो तुम
और खामोश रहो
क्या फर्क पड़ता है। बिलकुल नहीं!
मरने वाला न भाई था न ही संबंधी
फिर क्यूँ बोलोगे तुम! हरगिज़ नहीं
पूछने का तो अब कोई जवाज़ ही नहीं
तो खामोश रहो,
फिर भी अगर झिंझोड़े ज़मीर तुम्हारी
और आत्मा पूछ ही डाले तुम्हारी
तो बस कह देना : न ही मैं देशद्रोही
न अरबन नक़सल कहलाने का शौकीं
इस लिए खामोश रहो
फिर आ जाए जब तुम्हारी बारी
और भीड़ पड़ जाए तुम पे भारी
तो शिक़वा न करना किसी से भी
तुम ने भी इख्तियार की थी खामोशी!
बस, अब भी खामोश रहो